किताबों के लिए भी रुपए नहीं थे, पर आईआईटी से बना इंजीनियर | आज दैनिक भास्कर में पंकज के कहानी |

अपने मजबूर हालात पर रोते रहने से कुछ नहीं होता है। लेकिन, उन्हीं कमजोरियों को ताकत बनाकर संघर्ष किए जाने पर जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन संभव है। बिहार के छपरा जिले का रहने वाला पंकज सिंह इसका एक जीता-जागता उदहारण है। पंकज के पिता गजेन्द्र सिंह को पैसे के अभाव में नहीं पढ़ पाने का दुःख बहुत सताता था।
उनकी बस एक ही चाहत थी कि उनके चारो बच्चे पढ़-लिख कर उनके अधूरे सपनों में रंग भर दें। पंकज बचपन से ही बड़ा होनहार था। गजेन्द्र सिंह बहुत खुश रहते थे उसकी मेहनत को देखकर। लेकिन, उनके पास इतने भी पैसे नहीं थे कि पंकज को एक छोटे से प्राइवेट स्कूल में भेज सकें। कोई रोजगार नहीं था। आज से लगभग दस साल पहले एक कॉन्ट्रैक्ट का काम करके बमुश्किल दो हजार रुपए कमा पाते थे। दो वक्त की रोटी का जुगाड़ एक उपलब्धि होती थी परिवार के लिए।
पंकज बताता है कि उसके गांव में जो सरकारी स्कूल था उसका कोई अपना भवन नहीं था। इस हालत में स्कूल एक पीपल के पेड़ के नीचे ही चलता था। सुबह-सुबह स्कूल जाते समय मां पंकज को रात की बची दो रोटी और थोड़ी सी चीनी भी दे देती थीं। अब पंकज आठवीं कक्षा में पहुंच गया था। उसकी बहुत इच्छा होती थी कि उसके पास अगर चार-पांच कॉपियां होती तब वह सभी विषयों के अलग-अलग नोट्स बनाता। इसी दौरान एक दिन पंकज के मामा उससे मिलने आए और पंकज के लिए एक दर्जन कॉपियां खरीद दी। पंकज दसवीं तक उसी एक दर्जन कॉपियां से काम चलाता रहा। बाकी सारा काम स्लेट पर कर लेता था। दसवीं की परीक्षा के लिए फॉर्म भरना था। घर में पैसे भी नहीं थे। किसी से उधार लेकर पंकज ने दसवीं की परीक्षा के लिए फॉर्म भरा था।
दसवीं के रिजल्ट के बाद पंकज का परिवार बहुत खुश था। अच्छे मार्क्स आए थे। अब गजेन्द्र सिंह को लगने लगा कि उनका बेटा जरूर उनके सपनों को साकार कर देगा। पंकज गणित में बहुत रुचि लेता था और कंप्यूटर के बारे में जानकारियां इकट्‌ठा करता रहता था। वह कंप्यूटर इंजीनियर बनना चाहता था। अब तक वह जान चुका था कि भारत में कंप्यूटर इंजीनियर की पढ़ाई के लिए आईआईटी से और कोई बड़ा संस्थान नहीं है। पंकज कहता है कि मेरे पास पटना आने के लिए भाड़ा तक नहीं था, उस हालत में मैं पटना या कोटा में कोचिंग की बात सोच भी कैसे सकता था। लेकिन, उसके किसी दोस्त ने एक दिन सुपर 30 के बारे में पढ़ा। फिर क्या पंकज पटना मेरे पास आ गया।
उसकी सरलता और प्रतिभा से मैं प्रभावित हो गया। पंकज अब सुपर 30 का स्टूडेंट था। खूब मेहनत करता था। मैं अक्सर उससे पूछता था कि पंकज कंप्यूटर इंजीनियर बन रहे हों न? वह भी हंसते हुए जवाब देता था जी सर। पक्का। अब इंतजार की घड़ियां खत्म हो चुकी थी। पंकज बहुत अच्छे रैंक से आईआईटी प्रवेश-परीक्षा क्वालीफाय कर चुका था। आखिरकार पिता-पुत्र का सपना पूरा हो गया। पंकज का एडमिशन आईआईटी कानपुर के कंप्यूटर साइंस डिपार्टमेंट में हुआ था। वह बार-बार बोल रहा था कि सर मैं कितना खुश हूं आपको बता नहीं सकता हूं। पंकज की पढ़ाई पूरी हो गई और उसकी नौकरी एक बहुत ही बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में लग गई। वह अभी बेंग्लुरु में है। अपने माता-पिता के लिए घर भी बनवा दिया है। भाई की दिल्ली में नौकरी लग गई है।

मैं यहाँ पंकज की दो तस्वीर पोस्ट कर रहा हूँ | एक उस समय की जब पंकज सुपर 30 था और एक अभी की |

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