तेजी से फ़ैल रहे कोरोना संक्रमण ने भारत समेत पूरी दुनिया को बेहाल कर रखा है। देश में संक्रमितों का आंकड़ा 50 हजार को पार कर गया है। वहीं बिहार में भी संक्रमितों का आंकड़ा 569 (खबर लिखे जाने तक) हो गया है। लेकिन इस महामारी की गंभीरता को लेकर बिहार सरकार और सभी जिलों के प्रशासन लापरवाही बरतने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। बाहर के राज्यों से बिहार आ रहे मजदूरों को गृह जिले तक ले जाने के दौरान केंद्र सरकार के दिशानिर्देश और सोशल डिस्टेंसिंग की सरआम धज्जी उड़ाई जा रही है। बसों में यात्रिओं की ओवरलोडिंग कर उन्हें जानवरों की तरह ठूस कर ले जाया जा रहा है। मानो जैसे बिहार सरकार ने कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए दवाई पहले से खोज रखी हो।

शासन की पारदर्शिता खत्म, मीडिया पर प्रतिबंध:

लोकल मीडिया के द्वारा लगातार चलाई जा रही खबरों के बाद भी शासन-प्रशासन संभलने का नाम नहीं ले रही है। इस विकट काल में सरकार ने लोकतंत्र की पारदर्शिता को भी खत्म कर दिया है। मीडिया पर तमाम पाबंदियां लगा दी गईं हैं। बिहार सरकार ने बाहर से आ रही ट्रेनों की जानकारी मीडिया को देने से रोक लगा दी है। राज्य के क्वारंटाइन सेंटर के अंदर मीडिया के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है। साथ ही जिलाधिकारी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को भी मीडिया से दूर रहने का निर्देश दिया गया है। ताकि सरकार की कुव्यवस्था की तस्वीर सामने ना आए और सुशासन की चादर सरकार ओढ़े रहे।

बाहर के राज्यों से आए 16 मजदूर कोरोना पॉजिटिव:

मजदूरों को ट्रेन से गृह जिला तक लाने के दौरान मधुबनी जिला प्रशासन की लापरवाही और संवेदनहीनता में कोई कमी नहीं है। बसों में लोगों को सभी गाइडलाइन को ताक पर रख कर लाया जा रहा है। इस मामले में जिला प्रशासन से सवाल करने पर जिलाधिकारी समेत सभी अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं। लेकिन बड़ा सवाल है कि इन बसों में यदि कोई एक भी यात्री Covid-19 पॉजिटिव पाया जाता है, तो जाहिर है संक्रमण बस में सफ़र कर रहे सभी लोगों तक पहुंचेगी। उसके बाद संक्रमण का फैलाव क्वारंटाइन सेंटर में भी होगा। लेकिन सरकार और प्रशासन को इन तमाम सवालों और जिम्मेदारियों से कोई वास्ता नहीं है। बाहर से आ रहे मजदूर इंसान नहीं है, ज़िंदा रहें या मर जाएं यहां किसी को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। बता दें कि शुक्रवार को बाहर से आए 16 मजदूरों में कोरोना का संक्रमण पाया गया है। सवाल फिर यही है कि कोरोना जांच बड़ी संख्या में हो नहीं रही है और टेस्ट का रिपोर्ट आने में तीन दिन लगता है। फिर इतनी बड़ी लापरवाही क्यों बरती जा रही है?

मधुबनी सांसद का मोबाईल स्विच ऑफ, दरभंगा सांसद गुमशुदा:

जब प्रशासन के तरफ से कोई जवाब नहीं मिला तो Abp Bihar ने मधुबनी के सांसद अशोक यादव से संपर्क किया। बता दें कि पिछले लोकसभा चुनाव में मधुबनी की जनता ने बीजेपी उम्मीदवार अशोक यादव को 4 लाख 55 हजार की रिकॉर्ड मतों से जीता कर लोकसभा में भेजा था। मधुबनी सांसद, बिहार में सबसे अधिक मतों के अंतर से विजयी होने वाले सांसद हैं। नेताजी चुनाव जीतकर दिल्ली पहुंचे और उन्हें दिल्ली इतना रास आया कि मधुबनी लौटने का मन ही नहीं किया। कोरोना काल में जब जनता तबाह है, प्रशासन संवेदनहीन हो गई है, माननीय सांसद महोदय दिल्ली में ही हैं। तीन दिन की अथक प्रयास के बाद जब Abp Bihar का उनसे संपर्क संभव हो पाया तो सांसद जी ने क्या कहा बताने से पहले बता दें कि सांसद महोदय का निजी मोबाइल नंबर स्विच ऑफ है। वह किसी से भी संपर्क नहीं कर रहे हैं। वह तो गनीमत रहा कि सूत्रों के माध्यम से उनके निजी सचिव का नंबर उपलब्ध हो गया और उनसे संपर्क संभव हो सका।

सांसद ने कहा- लोग नहीं मान रहे, प्रशासन की क्या गलती है?

सांसद जी के सामने जिले की वस्तुस्थिति रखने के बाद उन्होंने कहा कि लोग मानने को तैयार नहीं हैं। स्पष्ट है जब लोग मानने को तैयार नहीं है तो ये शासन प्रशासन और बांकी तामझाम की क्या जरूरत है? उखाड़ फेंक देना चाहिए इस सिस्टम को और मनुष्य को फिर से आदिमानव काल में भेज देना चाहिए। तंत्र और सिस्टम का निर्माण इसलिए तो किया गया था कि तंत्र लोगों को एक व्यवस्था में रखेगी। व्यवस्था को न मानने वालों को दंडित किया जाएगा। खैर, सांसद महोदय ने हमें आश्वासन दिया कि वे जिलाधिकारी से बात कर समस्याओं का हल निकालेंगे और हमें सूचित करेंगे। लेकिन ये आश्वासन बस कहने को था क्योंकि हमने जो लापरवाही के साक्ष्य और लोगों की समस्याओं की वीडियो फूटेज उनके निजी सचिव के whatsaap पर भेजा था, उस मैसेज को अभी तक सीन भी नहीं किया गया है।

ये तो मधुबनी के सांसद की स्थिति थी, दरभंगा के सांसद भी गुमशुदा हैं उनसे हम संपर्क करने का प्रयास कर रहे हैं, प्रयास का आज चौथा दिन है। जब उन तक पहुंचने में सफल हो जाएंगे तो रिपोर्ट आप तक पहुंचाएंगे। दूसरी तरफ सुपौल के सांसद दिलेश्वर कामत से एक युवक ने फोन कर मदद मांगी तो सांसद महोदय ने जवाब दिया कि हम मुसलमानों के वोट से सांसद नहीं बने हैं। लोगों ने आस लगाकर इन्हें अपना जनप्रतिनिधि चुना था और लाखों लोगों की वोट की गर्मी ये जनप्रतिनिधि सहन नहीं कर पाते हैं और अपने ही जनता से संकट की घड़ी में मुंह मोर लेना दुर्भाग्यपूर्ण है।

ये बस ड्राईवर कोरोना वारियर की श्रेणी में आएंगे ??

समस्या सिर्फ यह नहीं है कि बाहर से आ रहे लोग कुव्यवस्था का शिकार हो रहे हैं। उनको लाने जा रहे बस ड्राईवरों की समस्या अलग है। उन्हें खाना नहीं दिया जा रहा है। 24 घंटे में 14 से 16 घंटे वे बस चला रहे हैं। संक्रमण का ख़तरा उन्हें भी है। लेकिन प्रशासन को जब उनके भूख का ख्याल नहीं है तो संक्रमण तो दूर की चीज है। उनका कहना है कि मना करने के बावजूद भी प्रशासन ओवरलोडिंग करने को मजबूर कर रही है। खाना मांगने पर तीन-चार साहबों के पास दौरा दिया जा रहा है। झिझिर कोना के खेल में खाना हाथ नहीं लगता है। ड्राइविंग करने से मना करने पर उन्हें ब्रेक डाउन की धमकी दी जा रही है।

तमाम सवाल हैं.. जवाब देने वाला कोई नहीं है.. घर में रहिए और सुरक्षित रहिए….. लेकिन एक सवाल आप पाठकों के लिए, क्या ये बस ड्राईवर कोरोना वारियर की श्रेणी में आएंगे ?? जो भूखे पेट अपनी जान जोखिम में डाल कर प्रवासी मजदूरों को घर तक ला रहे हैं…. Input – ABP BIHAR

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