पूरे देश में पिछले महीने लगे लॉक डाउन को 14 अप्रैल को 21 दिन पूरे हो गए और फिर इसी दिन प्रधानमंत्री ने इसे 19 दिन और आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। इस घोषणा के बाद देश के तमाम शहरी और ग्रामीण इलाकों में एक तरह का मानसिक बोझ बढ़ गया। लोगों का आनाजाना बंद हो गया। लेकिन शहर और गांव की पाबंदिया और परेशानियां एक जैसी हैं क्या?

गांव की परिभाषा को सही रूप देने वाली अगर कोई फेहरिस्त तैयार की जाए तो उस लिस्ट में बिहार शीर्ष के कहीं आस पास नजर आएगा जहाँ की समस्याएं(न्यूज़ रूम की भाषा में खबरमुख्य धारा की मीडिया में नगण्य हैं क्योंकि दिल्ली वाली मीडिया से बिहार दूर है।

बिहार की खबरें तभी मीडिया के बड़े घरानों में दिखाई देती है जब मौत का आंकड़ा बढ़ने लगता हैवो भी अधिकतर टॉप 100 तक ही सिमट कर रह जाता है.   

कुछ दिन पहले बिहार के जहानाबाद में एम्बुलेंस ना मिलने से तीन साल के एक बच्चे की मौत हो गई। इस महीने की शुरुआत में मोतिहारी के मधुबन क्षेत्र की लड़की पीएचसी अस्पताल के सामने तड़पती रही पर कोरोना के डर से डॉक्टर तक पास नहीं गए।

ऐसे ही कई गंभीर मामले हैं जो बिहार में आम हैं। मौजूदा समय में मरीजों की मौत या इलाज की गुहार खबर के वायरल होने का रास्ता देखती है। टी.आर.पी का रकबा इतना बड़ा है कि बच्चे की मौत पर सवाल नहीं बल्कि संवेदना जताई जाती है। इसके अलावा बिहार में सरकारी आंकड़े पर विश्वास करना बेमानी ही होगा क्योंकि सबको पता है कि यहां महकमा किस तरह से काम करता हैइस नई मौत से पहले भी परोक्ष रूप से मौत की कई साजिशें रची गई हैं

नियोजित शिक्षक के रूप में हड़ताल पर बैठे पूर्वी उत्तर प्रदेश के सीमा के निकट बिहार के बक्सर जिले में रहने वाले शिक्षक सुनील सिंह ने बताया कि ,  ‘‘आज कोरोना से हुई एक मौत पर केंद्र और राज्य सरकार थर्रा जा रही है पर बिहार के अहंकारी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मौत का ब्योरा अपने हिसाब से पेश कर रहे हैंआज पिछले कई महीनों से हड़ताल पर बैठे बिहार के नियोजित शिक्षकों में 42 लोगों की मौत हो गई है पर एक भी खबर मुख्य धारा की मीडिया में नहीं दिखाई जा रही हैआज हड़ताल की वजह से शिक्षकों का वेतन करीब 4 महीनों से रोक कर रखा गया हैजिसकी वजह से आज शिक्षक इस सम्मानित पेशे में रह कर भुखमरी की स्थिति में  गए हैं। आज शिक्षकों को सब्जी के ठेले तक लगाने पड़ रहे हैंआज कोरोना की मौत से ज्यादा बिहार की जनता मुख्यमंत्री द्वारा पूर्व में लिए गए अहंकारी फैसलों से मर रही है|’’

पिछले महीने से लेकर अबतक बिहार के पी.एम.सी.एच अस्पताल के डॉक्टरों और नर्सों के समूहों ने कोरोना वायरस के प्रकोप के बीच जांच किट और पी.पी. की मांग करते हुए अनेक वीडियो जारी किये जिसके बाद उन्हें एक पारदर्शी चोला दे दिया गया जो सुरक्षा के लिहाज से निम्न स्तर का था।

एक तरफ नीतीश कुमार अपने बयान में यह कहते नजर आये कि उनके पास कोरोना की जांच के लिए टेस्टिंग किट और पी.पी. की कमी है जबकि बिहार के ही स्वास्थ्य मंत्री मंगल पाण्डेय ने एक पत्रकार से बातचीत के दौरान यह मानने से साफ इनकार कर दिया कि टेस्टिंग किट की कमी की वजह से बिहार में कोरोना जाँच करने में देरी हो रही है। 

वैसे इसका साफ उदाहरण हर जगह देखने को मिल रहा है। बक्सर जिले के बरांव पंचायत में हार्वेस्टर चलाने के दौरान एक फोर मैन सरजीत सिंह(बदला हुआ नामको यह कह कर के पकड़ा गया कि वह दूसरे राज्य से आये हैं इसलिए उनको जांच करानी होगी।  उन्होंने बताया, ‘‘ 12 दिन बीत जाने के बाद भी मेरी कोई जांच नहीं की गई। वहीं इतने दिन तक मेरे खाने के लिए भी प्रशासन द्वारा कोई इंताजाम नहीं किया गया था और अंततः अनुनय विनय करने पर लम्बे अंतराल के बाद मुझे छोड़ दिया गया।’’

सरजीत जैसे कई ऐसे मामलें हर रोज देखने को मिल रहे हैं जो बिहार की लचर स्वास्थ्य एवं प्रशासनिक व्यवस्था की कलई खोल रहे हैं।

बक्सर जिले के ही केसठ ब्लॉक के राम चाँद सिंह (बदला हुआ नामबताते हैं,’’

‘‘ मैं बहरीन से 21 मार्च को घर पहुंचा जिसके बाद मुझे क्वारंटीन सेंटर बक्सर (अहिरौलीके एक स्कूल में रखा गयास्थिति इतनी गंभीर है कि डॉक्टर एक बार टेस्ट सैम्पल लेकर चले जाते हैं उसके बाद 8 दिनों तक कोई आसपास यह भी बताने के लिए नहीं आता कि कब क्या होने वाला हैजो मानसिक रूप से पीड़ादायक है। शौचालय एवं नहाने के स्थान की इतनी बुरी स्थिति है कि बताया नहीं जा सकता। जब मैं क्वारंटीन में था तो उस वक्त वहां मौजूद अधिकारियों से जब यह सवाल पूछा, ‘अगर आप लोगों की इस लापरवाही की वजह से कोई दुरुस्त इंसान संक्रमित हो जाता है तो उसका जवाबदेह कौन होगा?’ तो इसके जवाब में मुझसे यह कहा गया कि आप इस देश के प्रधानमत्री नहीं हैं जो आपके लिए शोक मनाया जाएगा। कुल मिलाकर वो बीते 8 दिन काफी कष्टदायक और डराने वाले रहे। मीडिया से संपर्क करने की कोशिश करने पर एक जानेमाने चैनल के पत्रकार ने यह झट से कह दिया कि ज़िलाधिकारी के आदेश के बिना मैं कोई खबर नहीं रिपोर्ट कर सकता।’’

नवानगर प्रखंड के गिरिधर बरांव के निवासी अजीत सिंह बताते हैं कि , ‘‘ एक अप्रैल को हमारे प्राथमिक विद्यालय के पास एक क्वारंटीन सेंटर बनाया गया थाक्वारंटीन सेंटर ऐसा जहां ना रहने की कोई उचित व्यवस्था ना ही शौच की कोई व्यवस्थाऊपर से उस में रह रहे लोगों के खानेपीने की व्यवस्था भी उनके घर वाले आकर पूरा किया करते थे। वो तो प्रशासन के सामने होहल्ला मचाने के बाद प्रशासन ने उन्हें हटा दिया लेकिन यह सोचिये कि इस तरह की लापरवाही भरे कृत्य से गाँव में रह रहे लोगों के लिए कितना खतरा हो सकता है पर अगर कहीं से ऐसे विरोध की खबर  भी रही है तो उसे ऐसे पेश किया जा रहा है मानो गाँव वाले मूर्ख हैं और उन्हें क्वारंटीन सेंटर की समझ नहीं है पर ऐसे खबरों को दिखा कर सरकार के अधूरे व्यवस्था पर पर्दा डाला जा रहा है।’’

प्रतीकात्मक तस्वीर

कुछ दिन पहले आपने टी.वी पर,‘‘ बिहार का वुहान बना सिवान’’ नामक शीर्षक स्लग के रूप में अपने इडियट बॉक्स पर देखा होगा जिस के बाद कलेक्टर के साथ साथ एक चैनल का पत्रकार भी पी.पी. समान दिखने वाला कोई चोला पहन नजर आया जिसने अपने वक्तव्य में पुलिस की मुस्तैदी समेत सैनिटाइजर के महत्व को गिनाते हुए सीलबंद इलाकों का जुबानी ब्योरा दे डाला जिससे यह लगा कि संक्रमित इलाके में पहुंची पुलिस मानो कितने दिनों से कर्तव्यपरायण होकर सिवान और उसके आसपास के गाँव पर नजर रख रही होपर क्या यह सच थासिवान से करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर बसे गोरेयाकोठी विधान सभा क्षेत्र के एक छात्र अंकेश कुमार ने यह बताया, ‘‘ जब से कोरोना संक्रमण की खबर आम हुई है तब से कई घरों में दैवीय हस्तक्षेप की प्रतीक्षा में कई पूजन तक करा दिए गए हैं पर प्रशासन अपने कार्य में इस से पहले बिल्कुल भी निकम्मों की तरह पेश  रही थी। हमारे गांव में पुलिस को पैसा देकर कहीं भी जाया जा सकता थायही नहीं गाँव में तो तमाम दुकानें खुली हैंइसके साथसाथ लोगों के आम जन जीवन पे किसी भी तरह का कोई प्रभाव नजर नहीं  रहा है और ऐसा कतई महसूस नहीं हो रहा कि देश में लॉकडाउन भी है।

आज बिहार के ग्रामीण इलाकों में कोरोना के चलते किये गए लॉक डाउन का ‘क्या असर है’? और ‘क्या असर वास्तव में होना चाहिए था’? इस में काफी गहरा फासला लोगों के बयानों में पढ़ा जा सकता है। इसके साथसाथ सरकार द्वारा पूर्व में लिए गए फैसलें भी मौत के आंकड़ो को बढ़ा रहे हैंभले ही वजह के निहितार्थ कुछ भी हो पर मौत कोई शब्द या संख्या मात्र नहीं है जिसे कह कर छुटकारा पा लिया जाएइसकी भी एक पृष्ठभूमि होती है जो समाप्त हो जाने के बाद अपने चुने नेता पर रखे विश्वास द्वारा अभिशप्त नजर आती हैआज परिवर्तनकामी नेताओं की भूमि बिहार के रणबाँकुरों की टोली ना जाने किस आखेट पर निकली है पर सरकार अपने जहन में इतना जरुर याद रखें कि अप्रत्याशित स्थितियां अप्रत्याशित फैसलों की मांग करती हैं और मीडिया को अपने काबू में रख कर सरकार और मीडिया की परस्पर सांठगांठ लंबे समय तक पोषित नहीं हो सकती है।

यह रिपोर्ट रजत परमार की है. वह  भारतीय जनसंचार संस्थान के छात्र एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं.     

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