गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुरेव परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।
गुरु पूर्णिमा का पर्व महर्षि वेदव्यास जी के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है, उन्होंने अपने जीवन काल में ब्रह्मसूत्र,श्रीमद भगवत गीता, महाभारत, 18 पुराण जैसे साहित्य की रचना की उनकी इस उपलब्धि तथा उनके सम्मान हेतु गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है।
शिष्यों के जीवन में गुरु का स्थान सर्वोपरि है, गुरु ही है जो अपने शिष्यों को ग़लत और सही का भेद बताता है। आज के दिन शिष्य अपने गुरूओं का शुक्रगुज़ार करते हैं उनका आशीर्वाद लेते हैं तथा उन्हें यह एहसास कराते हैं कि आज वह जो भी है केवल अपने गुरूओं के कारण है। गुरु का महत्त्व कबीरदास जी के एक दोहे से साफ़ स्पष्ट होता है, जिसमें वे कहते हैं-
“गुरु गोबिंद दोउ खड़े काके लागू पाए
बलिहारी गुरु आपने गोबिन्द दियो मिलाए”
इस दोहे से साफ़ स्पष्ट होता है कि गुरुओं का स्थान भगवान से भी ऊपर है।
गुरुओं का पूजन पौराणिक काल से ही देखा जाता है जहाँ पर देवी देवताओं के भी अपने गुरु होते थे और वह उनका काफ़ी सम्मान किया करते थे।
मान्यता है कि आज के दिन गुरुओं का आशीर्वाद लेने से सभी कष्टों का हरण होता है।

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