25 मार्च 2020 लॉकडाउन का पहला दिन पूरे देश में कोरोना का क़हर छाया हुआ था,  संसार के अलग- अलग देशों में लॉकडाउन को अपनाया गया । कोरोना ऐसी महामारी है जिसको केवल सामाजिक दूरी से ही बढ़ने से रोका जा सकता है। जब तक कोरोना की वैक्सीन नहीं बन जाती तब तक इससे बचने का केवल एक ही उपाय था लॉकडाउन, 24 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संपूर्ण देश को संबोधित करते हुए अगले दिन से सम्पूर्ण लॉकडाउन का ऐलान किया।

यह जो लॉकडाउन का फ़ैसला लिया गया , यह बिना तैयारी के लिया गया, मध्यम वर्ग तथा निचले वर्ग के लोगों को ध्यान में रखकर सोचा ही नहीं गया, आजीविका के लिए मज़दूर एक राज्य से दूसरे राज्य पलायन करते हैं , कुछ ऐसे मज़दूर भी होते हैं जिनका कोई ठिकाना नहीं होता है जहाँ उनको काम मिलता है वे उधर पलायन करते हैं ऐसे मज़दूरों को घूमंतू मज़दूर कहा जाता है, संपूर्ण लॉकडाउन के बाद इन मज़दूरों की स्थिति दयनीय हो गई क्योंकि ये लोग रोज़ कमाते हैं रोज़ खाते हैं।

आज लॉकडाउन को लगभग 55 दिन हो चुके हैं इन मज़दूरों के पास जितनी जमापूंजी दी वह ख़र्च हो चुकी है। जिन सड़कों का निर्माण इन मज़दूरों ने किया है आज उसी पे चलना इन लोगों के लिए दुश्वार है, रोज़ किसी न किसी मज़दूर की मृत्यु की ख़बर आती है क्योंकि इनका घर कोई एक दो किलोमीटर की दूरी पर नहीं है, इन्हें 15 से दो हज़ार किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी है। न इनके पास जाने का ज़रिया है न ही सरकार से मदद, इतनी कड़ी धूप में 35 डिग्री तापमान में अपने दिल पर पत्थर रखकर बस पैदल चले जा रहे हैं ना इनके पास खाने को खाना है न पहनने को चप्पल। इन सभी मज़दूरों का कहना है अगर हम अपने घर नहीं पहुँचे तो कोरोना से पहले हमें हमारी भूख मार देगी।आख़िर कब तक झेलें, इससे बेहतर है हम गाँव जाकर ही मरें …

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