चेपॉक स्टेडियम में रणजी ट्रॉफी का फाइनल चल रहा था. पिछले 14 सालों से रणजी ट्रॉफी बॉम्बे की टीम लगातार जीतती हुई आ रही थी. ये साल 1973 था. एक दफ़ा फिर बॉम्बे की टीम फ़ाइनल में थी. सामने तमिलनाडु की टीम थी. पिच इस अंदाज़ से काढ़ी गयी थी कि बॉम्बे भागने की कोशिश ही न कर पाए. तमिलनाडु का प्लान था कि बॉम्बे को रनों के लिए तरसाना है और उन्हें स्पिन के जाल में फांसना है. उनके दो सबसे बड़े हथियार थे – श्रीनिवासराघवन वेंकटराघवन और वामन विश्वनाथ कुमार. वामन अपने करियर के अंतिम पड़ाव पर चल रहे थे. 1961 में उन्होंने अपने करियर के अकेले 2 टेस्ट मैच खेले.

पहला मैच उन्होंने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ खेला था जिसमें पहली ही इनिंग्स में उन्होंने 5 विकेट लिए. सेलेक्टर्स के चेयरमैन विजय हज़ारे ने वो परफॉरमेंस देख कर कहा कि इंडियन टीम को अगले 10 सालों के लिए एक स्पिनर मिल गया है. लेकिन 9 महीने बाद वामन ने दूसरा और आख़िरी टेस्ट मैच खेला. वो हमेशा कहते थे कि मंसूर अली खान पटौदी के चलते उन्हें कभी भी टेस्ट टीम में जगह नहीं मिली जबकि वो इसके पूरे हक़दार थे. खैर, बॉम्बे 151 रनों पर आउट हुई. वेंकटराघवन और वामन ने 5-5 विकेट लिए. पहले दिन का खेल अभी बाक़ी था. तमिलनाडु के बल्लेबाज़ बैटिंग करने के लिए आये. दिन ख़तम होते होते तमिलनाडु अच्छी पोज़ीशन में दिखाई दे रही थी. 62 रन और 2 विकेट. 56 रनों की पार्टनरशिप चल रही थी.

दूसरे दिन का खेल शुरू हुआ और शुरुआती आधे घंटे के बाद गेंद बॉम्बे के स्पिनर पद्माकर शिवलकर के हाथ में थमाई गयी. पहली गेंद टर्न के साथ साथ बाउंस भी हुई. पूरे मैच में ये अब तक की सबसे ज़्यादा टर्न देखी गयी थी. क्रीज़ पर नंबर 3 और नंबर 4 के खिलाड़ी मौजूद थे. ड्रेसिंग रूम में तमिलनाडु के नंबर 10 पर बैटिंग करने वाले कालयसुन्दरम और वामन कुमार ने एक दूसरे को देखा. दोनों को साफ़ दिखाई दे रहा था कि गेंद बाउंस के साथ साथ कितनी भयानक टर्न हुई है. वामन ख़ुद उठे, कालयसुन्दरम को उठाया और कहा कि किट पहन कर बैठ जाओ, थोड़ी देर में पैड-ग्लव्स भी पहन लेना, 1 घंटे के अंदर हमारी बैटिंग आने वाली है.

वामन कुमार की बात अक्षरशः सही साबित हुई. अगले 18 रनों में तमिलनाडु की टीम 8 विकेट खो चुकी थी. 62 पर 2 विकेट से स्कोर मात्र 80 रन पर पहुंचा. दूसरे दिन गिरने वाले 8 में से शिवलकर ने 7 विकेट लिए. 1 विकेट वो पिछली शाम ले चुके थे. इनिंग्स में कुल 8 विकेट. 17.5 ओवर में उन्होंने 10 ओवर मेडेन फेंके थे. रन खर्चने में भी भरपूर कंजूसी. उनका फ़िगर था 17.5 – 10 – 16 – 8

अगली इनिंग्स में उन्होंने 5 विकेट लिए. बॉम्बे ने रणजी ट्रॉफ़ी जीती. 5 दिन का मैच 2 दिन और तीसरे दिन की मात्र 1 बॉल लम्बा खिंचा.

पद्माकर शिवलकर बॉम्बे के रणजी इतिहास में सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले खिलाड़ी होते थे. लेकिन इस कमाल की गेंदबाज़ी के बावजूद उनके खाते में इंडिया के लिए खेलना नहीं चढ़ा. वामन जब ये कहते हैं कि पटौदी ने उन्हें नहीं खेलने दिया तो वो अपने साथ शिवलकर का नाम भी लेते हैं. दोनों अलग-अलग राज्य के लिए खेलते थे लेकिन एक दूसरे की बहुत इज्ज़त करते थे और अच्छे दोस्त थे. वामन का कहना था कि पटौदी सिर्फ़ और सिर्फ़ उस चौकड़ी को खिलाना चाहते थे जिसे हम वेंकट, बेदी प्रसन्ना और चंद्रा के नाम से जानते हैं. और इस वजह से शिवलकर और वामन के वो सबसे मज़बूत 5 साल ज़ाया चले गए जिसमें वो सबसे बेहतरीन परफ़ॉर्म कर सकते थे. बकौल वामन, ‘उस टाइम जयसिंहा बॉलिंग खोलता था और 3-4 गेंद फेंकने के बाद गेंद को ज़मीन पर घिस देता था. इसके बाद चंद्रशेखर को बॉलिंग मिल जाती थी.’

मंसूर अली खान पटौदी अपने टीम के सदस्यों के साथ (तस्वीर क्रेडिट- द हिन्दू)

शिवलकर का क्रिकेट से कोई वास्ता नहीं था. दुनिया की तमाम हसीन कहानियों में बेरोज़गारी और एक दोस्त की जगह हमेशा होती है. शिवलकर के केस में भी यही हुआ. उनके पास कोई काम नहीं था तो उनका दोस्त दत्तू सतेलकर उन्हें हिन्दू जिमखाना लेकर गए. वहां एक कैम्प लगा हुआ था जहां खिलाड़ियों के ट्रायल चल रहे थे. शिवलकर ने वहीं किसी से मांगकर सफ़ेद किट पहनी और बॉल फेंकने के बारे में सोचने लगे. इस से पहले उन्होंने अपने हाथों से कभी भी लेदर वाली कड़क गेंद नहीं थामी थी. अभी तक वो टेनिस बॉल से कभी कभार खेला करते थे. इसी सब के बीच शिवलकर को एक और बड़ी बात मालूम चली. उन्हें बताया गया कि ट्रायल्स जिसकी देख-रेख में हो रहे हैं उस शख्स का नाम वीनू मांकड़ है. शिवलकर लगभग वापस जा चुके थे लेकिन दत्तू ने उन्हें रोक कर रखा.

नेट्स में शिवलकर का नंबर आया तो सबसे पहली गेंद नेट्स के बायें कोने में जाकर गिरी. अगली गेंद दायें कोने में. उनके दोस्त दत्तू चीखे – “अरे भंडार्या (शिवलकर भंडारी समाज से आते थे) सीधा फेंक न.” वीनू मांकड़ ने उन्हें रोका और कुछ समझाया. अगली गेंद एकदम सीधी पड़ी. इसके बाद वो एक भी गेंद फेंक पाते, वीनू मांकड़ ने उनसे पूछा कि क्या वो उनके कैम्प में आना चाहेंगे. शिवलकर ने हां कर दी लेकिन उन्हें कभी भी ये समझ में नहीं आया कि पहली 2 इतनी घटिया गेंदों और फिर एक बेहद औसत गेंद के दम पर वीनू मांकड़ ने उन्हें कैम्प में कैसे ले लिया. वीनू का कहना था कि मुझे ऐसे लोग चाहिए जो मेरा कहा मान लें, क्रिकेट तो मैं उन्हें सिखा ही दूंगा.

पद्माकर शिवलकर गाते भी थे. उन्होंने कुछ गाने कम्पोज़ किये और गाये जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे एक क्रिकेटर किस्मत के फेर में मारा जाता है और उसे वो नहीं मिलता जिसका वो पूरी तरह से हक़दार होता है. कहते हैं कि उनके गानों ने बहुतों को रुलाया है और बॉम्बे/मुंबई के क्रिकेटर्स के लिए उनके गाने ऐंथम सरीके होते थे.

पद्माकर शिवलकर का 14 अप्रैल को जन्मदिन होता है.

(14 को लिखना शुरू किया और काम के चलते ये ख़तम होते-होते तारीख़ बदल गयी.)

यह आलेख केतन मिश्रा की फेसबुक वॉल से लिया गया है. केतन पूर्व में ‘दी लल्लनटॉप’ के साथ जुड़े रहे हैं और इन दिनों ऑल्टन्यूज़ के साथ काम करते हैं…

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