सुखदेव का जन्म गांव गोपरा, लुधियाना, पंजाब के एक मध्यवर्गीय सिख परिवार में हुआ था। बचपन में सुखदेव थापर ने ब्रिटिश राज के क्रूर अत्याचारों को देखा। यही वजह थी कि आगे चलकर वह क्रांतिकारी बने और भारत को ब्रिटिशर्स के प्रभुत्व के बंधनों से मुक्त करने का संकल्प लिया।

वर्ष 1926 में, लाहौर में ‘नौजवान भारत सभा’ का गठन हुआ। इसके मुख्य योजक सुखदेव, भगत सिंह, यशपाल, भगवती चरण व जयचन्द्र विद्यालंकार थे। स्कूल समाप्त करने के बाद, उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज में प्रवेश लिया। जहाँ पर उनकी  मुलाकात भगत  सिंह से हुई। दोनों एक ही राह के पथिक थे, अत: शीघ्र ही दोनों का परिचय गहरी दोस्ती में बदल गया।

लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिये जब योजना बनी तो साण्डर्स का वध करने में इन्होंने भगत सिंह तथा राजगुरु का पूरा साथ दिया था। यही नहीं, सन् १९२९ में जेल में कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार किये जाने के विरोध में राजनीतिक बन्दियों द्वारा की गयी व्यापक हड़ताल में बढ़-चढ़कर भाग भी लिया था। 23 मार्च, 1931 को उन्हें लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई।

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