20 वीं सदी के जाने माने, हिन्दी भाषा के महान कवियों मे से एक सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई, सन 1900, को हुआ था। सुमित्रानंदन पंत अल्मोड़ा के कौसानी नाम के गाँव मे पले बड़े, जो इस वक़्त उत्तराखण्ड राज्य का हिस्सा है।
पंत बचपन से ही कविताओ मे रुचि रखते थे।
उन्होंने अपनी कविताओं का सार अपनी जीवनी और प्रकृति से उभारा। छोटी उम्र मे माँ के गुज़र जाने से, उन्होंने दर्द को नई परिभाषा दी जो आज उनकी कविताएँ बहुत खूबसूरती के साथ बया करती है।
साथ ही प्रकृति प्रेम की झलक भी विशेष रूप से देखने को मिलती हैं। पंत ने 18 वर्ष की आयु मे बनारस के क्वीन कॉलेज मे दाखिला लिया। जहां उन्होंने सरोजनी नायडू और रबीन्द्रनाथ टैगोर के कविताओ और लेखन को पढ़ना शुरू किया।
उसके बाद उनके बढ़ते रुझान ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी और वो एक साल बाद ही इलाहाबाद के muir कॉलेज चले गए।
1926 मे उन्होने अपनी पहली कविता “पल्लव” लिखी।
उसके बाद ‘मोह’, ‘विनय’ वसंत-श्री’, ‘याचना ‘ जैसी कई कविताएं लिखी। पंत ने अपने जीवन काल मे 28 कविताएं, निबंध और कविता नाटकों का लेखन किया। महात्मा गांधी और कार्ल मार्क्स जैसे महान लोग उनकी कविता के प्रेरणा का स्रोत बने। जिसके कारण उनकी कविताओं ने समाज और मानवता की ओर भी रुख लिया।
1961  मे पंत को सरकार द्वारा पद्मा भूषण सम्मान से नवाज़ा गया।  सिर्फ ये ही नहीं,  सन 1968 मे वो पहले हिन्दी कवि थे जिन्हें जननपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ये पुरस्कार उन्हें  सबसे प्रसिद्ध “चिदंबरा” के  बेह्तरीन कविता के रूप मे मिला। साहित्य कला के क्षेत्र मे इस पुरस्कार को एक उत्तमश्रेणी मे गिना जाता है।
किसी ने सही कहा है कवि कभी मरता नहीं।
आज भी सुमित्रानंदन पंत की कविताओ का संग्रह उनकी जन्म भूमि कौसानी मे मौजूद है।

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